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Thursday, January 15, 2015

कविता : समर्पण

रात्रि के तम को छिटककर
भानु ने फिर हाथ थमा
हुआ इस जाग मे उपस्थित
जग मे स्वर्ण आवरण सा डाला

बनना है तो बनो भानु
उसकी किरनो सा तुम फैलो
जाती रंग और देश भाषा की
छोड़ के पीछे फिकर तुम

मान मे रखो भाव ऐसा
जैसे भानु का तुम्हारा
खुद तो जलता है परंतु
जाग मे है वो करता उजियारा


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